
इस्लामिक कैलेंडर के मुताबिक, शब-ए -बारात शाबान महीने की 14 और 15 वीं तारीख के बीच की रात को मनाया जाता है। इसी के कारण निस्फ़ शाबान भी कहा जाता है। यह रात 14 की रात को शुरू होती है और 15 शाबान भोर को समाप्त हो जाती है। इस साल शब-ए-बारात 3 फरवरी, मंगलवार है। इस्लाम धर्म के मुकद्दस की रातों में शब-ए-बारात की रात को भी एक माना जाता है. शब-ए-बारात की रात लोग जागकर अल्लाह की इबादत करते हैं.
इन्तेज़ामिया कमिटी के सचिव मोलवी हसन उर्फ़ मक्खन ने बताया कि शब-ए-बारात ये उन पांच रातों में से एक होती है जिसमें अल्लाह जरूर अपने बंदों की दुआ को सुनता है।
मुस्लिम समुदाय के लिए शब-ए-बारात में दो दिन रोजा रखने का भी रिवाज है। पहला शब-ए-बारात के दिन और दूसरा अगले दिन रखा जाता है। इस रोजा को फर्ज नहीं, बल्कि नफिल रोजा कहा जाता है। कहा जाता है कि इस दिन रोजा रखने से व्यक्ति के पिछली शब-ए-बारात से इस शब-ए-बारात तक के सभी गुनाह माफ हो जाते हैं।
जबीना बेगम बताती हैं कि इस दिन रात के समय मुस्लिम समुदाय के लोग अल्लाह से क्षमा मांगते हैं। इसी के कारण इसे क्षमा की रात भी कहा जाता है। इसके साथ ही लोग अपने पूर्वजों की क्रबों के पास जाकर सजाते हैं और अल्लाह से दुआ करते हैं कि उन्हें जन्नत नसीब हो।
समाजसेवी नसरुद्दीन ने बताया कि मुस्लिम समुदाय के लोगों के लिए शब-ए-बारात का विशेष महत्व होता है. इस रात को गुनाहों से तौबा करने की रात भी कहा जाता है. इस दिन अल्लाह से क्षमा मांगने के साथ अपनी पूर्वजों की क्रबों के पास जाकर दुआ मांगते हैं और अल्लाह से दुआ करते हैं कि उन्हें जन्नत नसीब हो। इसे बेरात कांदिली, लैलातुल बारात, मोक्ष की रात और दक्षिण पूर्व एशियाई मुस्लिम देशों में निस्फु स्याबन के तौर पर जाना जाता है.
जानकारी के लिए बता दें कि शब-ए-बारात मुस्लिम समुदाय के लिए काफी महत्वपूर्ण पर्व मनाया जाता हैं। इसे शबे बारात, रबी में लैलातुल बारात, इंडोनेशिया और मलेशिया में निस्फ़ स्याबान जैसे नामों से भी जाना जाता है। दरअसल, इस पर्व को क्षमा की रात के रूप में मनाते हैं।