इंतजामिया कमेटी,तकिया जमाल शाह कब्रिस्तान करबला के मदरसा से तीन हाफ़िज़ बनें





दानापुर. इंतजामिया कमेटी,तकिया जमाल शाह कब्रिस्तान करबला में मदरसा चल रहा है. आज दिनांक 08/02/2026 को  मदरसा में पढ़ रहे सैकड़ों विद्यार्थीयों में तीन विद्यार्थीयों हाफ़िज़ (हाफ़िज़-ए-कुरान) बनें. 

सैयद सुलतान अहमद कादरी चिश्ती जी द्वारा बताया गया कि हाफ़िज़-ए-क़ुरआन वह व्यक्ति है जिसने पवित्र क़ुरआन के सभी 114 अध्यायों और 6,000 से अधिक आयतों को पूरी तरह से कंठस्थ (मुँह-ज़ुबानी याद) कर लिया हो। आज हमारे मदरसा की शान की बात है तीन विद्यार्थीयों ने इस मदरसा का नाम रौशन किया. उन्होंने बताया की अरबी में ‘हाफ़िज़’ का अर्थ ‘संरक्षक’ या ‘याद रखने वाला’ होता है। इस्लाम में, हाफ़िज़ को अल्लाह के नज़दीक एक सम्मानित व्यक्ति माना जाता है. हाफ़िज़ का होना बहुत बड़ी नेकी माना जाता है।

इंतजामिया कमिटी के सचिव मौलवी हसन उर्फ मक्खन बताते हैं कि हज़रत मुहम्मद 6वीं सदी में अरबिया में रहते थे जबकि बहुत कम लोग पढ़े-लिखे हुए थे। वह अपने इतिहास, वंशावली और काव्य को याददाश्त से ही सहेजते थे। हाफ़िज़-ए-कुरान बनने के लिए, पवित्र कुरान के सभी 30 पारों (Chapters) को याद करना होता है। इसमें एक योग्य उस्ताद (शिक्षक) की देखरेख, दृढ़ निश्चय, प्रतिदिन कुरान के एक निश्चित हिस्से को याद करना (हिफ़्ज़), और पहले से याद किए गए पाठ का बार-बार दोहराना (दौर) शामिल है। यह प्रक्रिया पूरी करने में आमतौर पर 1 से 4 वर्ष का समय लग सकता है। जो बच्चे हाफ़िज़ बनें है उन्हें कुरान पूरी तरह से मुंह-जुबानी याद (कंठस्थ) है, बच्चे का मोहम्मद अहमद अली, मोहम्मद अफकाम जावेद, मोहम्मद  समीर आलम हाफ़िज़ (Hafiz)  बने हैं। आज इन्हें दस्तार, पगड़ी, सर्टिफिकेट, इनाम के रूप में दिया गया.

इस मौके पर साहब सज्जादा सैयद शाह अध्मद सुलतान काचरी साहब, मौलवी हसन के साथ अन्य गणमान लोग उपस्थित रहें.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *